चाहत
ये कैसी ख्वाहिश है मेरी मैं क्या चाहती हूं
तेरी बाहों में आगोश चाहती हूं
थक गई हूं लड़ते लड़ते
तेरे पास सुकून चाहती हूं
साजिशों के घेरे अक्सर मुझे सख्त कर देते है
तेरे पास आकर पिघलना चाहती हूं
अकसर छोटी बातों पे दिल भर आता है
सिर्फ तुझसे गले लगकर आंसू बहाना चाहती हूं
खुद को भूल जाती हूं अक्सर
हा मैं मेरी तुझसे परवाह चाहती हूं
मसरूफियत की इस ज़िन्दगी में तुझसे कब मिलूंगी
मगर तेरे साथ हूं इसी सोच में खो जाना चाहती हूं
कितना मुश्किल है काबू करना जज्बातों को इससे वाक़िफ है हम मगर फिर भी तेरे साथ रह के बेकाबू होना चाहती हूं
मेरी हर ख्वाहिश तुझसे है मेरी खुशी तुझमें
तेरी हर हसरत खद से पूरी करना चाहती है
मेरा प्यार तुझसे मेरा रूठना तुझसे मेरी मोहब्बत तू
मेरा अक्स तू मेरी रूह तू
हो गई हर रस्म पूरी मोहब्बत की
बस अब तुझसे निकाह करना चाहती हूं।
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